मुक्ति और मोक्ष
भारतीय वांगमय में सबसे ज़्यादा भ्रमित करने वाला शब्द मोक्ष है। भ्रम का मूल कारण मोक्ष शब्द का उद्गम या व्युत्पत्ति है। व्याकरण की दृष्टि से “मुक्ति “ और “मोक्ष” दोनों शब्दों की मूल धातु मुच् है जिसका अर्थ है—"छोड़ना, मुक्त करना, बन्धन से छुड़ाना”। बस इन दोनों शब्दों की रचना (व्युत्पत्ति) अलग-अलग प्रत्ययों से हुई है और मोक्ष एक पुल्लिंग भाववाचक संज्ञा है जबकि मुक्ति एक स्त्रीलिंग भाववाचक संज्ञा है। यही इनका मुख्य व्याकरणिक अंतर है।
दोनों शब्द मूलतः मुच् धातु से बने भाववाचक शब्द हैं और दोनों का आधारभूत अर्थ “बन्धन से छूटना” ही है। हम कह सकते है की मुक्ति
और मोक्ष मूलतः परयाई वाची शब्द है, और अगर परयाई वाची है तो शाब्दिक तौर पर हम किसी भी वाक्य में इन्हें बराबर
इस्तेमाल कर सकते हैं। पर ऐसा नहीं है। हम यह तो कह सकते है की किसी व्यक्त को
कारागार से “मुक्ति” (निजात) प्राप्त हो गई है पर यह कभी नहीं कहते की उसको
कारागार से “मोक्ष” प्राप्त हो गया है।
एक और उदाहरण ऋग्वेद से
लेते हैं। ऋग्वेद के सप्तम मंडल की ऋचा ५९.१२ जिसे हम महामृत्युञ्जय मंत्र के नाम से जानते है में कहा गया है :
त्र्य॑म्बकं यजामहे सु॒गन्धिं॑
पुष्टि॒वर्ध॑नम् ।
उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒
बन्ध॑नान्मृ॒त्योर्मु॑क्षीय॒ मामृता॑त् ॥
अर्थ : "हम तीन नेत्रों वाले, सुगन्धि तथा सबका पोषण करने वाले भगवान रुद्र
की उपासना करते हैं। जैसे उर्वारुक (ककड़ी) अपने बन्धन (बेल) से बंधी रहती है वैसे
ही हम मृत्यु से बंधे हुए हैं. मुझे इस
मृत्यु के बन्धन से मुक्त करिये पर अमृतत्व से नहीं।
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्" का शाब्दिक अर्थ है—
"मृत्यु से
मुक्त होऊँ, अमृतत्व से
नहीं (वियुक्त होऊँ)"
अर्थात मृत्यु से
मुक्ति। यानि "मुक्ति" शब्द सरे वांड्मय में "निजात पाने" के
अर्थ में प्रयोग हुआ है और "मोक्ष" शब्द का उपयोग आध्यात्मिक सन्दर्भ
में हुआ है, आखिर क्यों?
सूक्ष्म अध्ययन यह संकेत देता है कि 'मुक्ति' शब्द का प्रयोग हिन्दू शास्त्रों में प्रायः नकारात्मक अथवा निषेधात्मक अर्थ
में हुआ है, अर्थात् ऐसी
घोर दुःखद, अवांछनीय अथवा
घृणित स्थिति से छुटकारा पाने के लिए, जिससे मनुष्य मुक्त होना चाहता है। ऊपर उद्धृत ऋग्वेद के मन्त्र में भक्त
भगवान शिव से प्रार्थना करता है कि वे उसे उस मृत्यु के बन्धन से मुक्त करें, जिससे वह अनिवार्य रूप से बँधा हुआ है।
भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के 51वें श्लोक में "जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः" शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ है—"जन्म के बन्धन से पूर्णतः
मुक्त होना।"
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि
फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥
(बुद्धियोग से
युक्त ज्ञानी पुरुष कर्मों के फल का त्याग करके जन्म-बन्धन से मुक्त हो जाते हैं
और उस दुःखरहित परम पद को प्राप्त करते हैं।)
श्रीमद्भागवत (2.10.6) में भी 'मुक्ति' शब्द का प्रयोग पुनः घृणित अज्ञान की उलझन से
छुटकारा पाने के अर्थ में हुआ है। इस श्लोक का अनुवाद करना कुछ कठिन है, क्योंकि संस्कृत शब्द 'निरोध' के एक से अधिक अर्थ हैं। तथापि, वर्तमान प्रसंग में इसका निकटतम अर्थ "समस्त मानसिक विक्षेपों का पूर्ण निरोध अथवा समाप्त हो
जाना" है।
निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः
सह शक्तिभिः ।
मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ॥ ६ ॥
(निरोध अर्थात्
समस्त मानसिक विक्षेपों का पूर्ण निरोध आत्मा तथा उसकी समस्त शक्तियों को उनके परम
विश्राम-स्थान—परमात्मस्वरूप—में प्रतिष्ठित कर देता है। 'मुक्ति' वह अवस्था है जिसमें जीव घृणित अज्ञान की उलझन का परित्याग करके अपने वास्तविक
स्वरूप में स्थित हो जाता है।)
अब आइए “मोक्ष” (मोक्ष) शब्द पर विचार करें। मोक्ष शब्द, मुक्ति के विपरीत, न तो चारों वेदों में और न ही उन 11 प्राचीन उपनिषदों में परिभाषित किया गया है, जिनकी रचना सम्भवतः 600 ईसा-पूर्व से 200 ईसा-पूर्व के बीच हुई और जिन पर आदि शंकराचार्य
ने भाष्य लिखा है। वास्तव में, मोक्ष शब्द का प्रयोग न तो किसी
वेद में हुआ है और न ही इन 11 प्राचीन
उपनिषदों में।
तब फिर मोक्ष की
ऐसी विशिष्ट, आध्यात्मिक
परिकल्पना आई कहाँ से ?
क्रमशः
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