Posts

Showing posts from August, 2026

मुक्ति और मोक्ष

  भारतीय वांगमय में सबसे ज़्यादा भ्रमित करने वाला शब्द मोक्ष है । भ्रम का मूल कारण मोक्ष शब्द का उद्गम या व्युत्पत्ति है। व्याकरण की दृष्टि से “ मुक्ति “ और “ मोक्ष ”   दोनों शब्दों की मूल धातु मुच्   है जिसका अर्थ है— " छोड़ना , मुक्त करना , बन्धन से छुड़ाना ” । बस इन दोनों शब्दों की रचना (व्युत्पत्ति) अलग-अलग प्रत्ययों से हुई है और मोक्ष एक पुल्लिंग भाववाचक संज्ञा है जबकि मुक्ति एक स्त्रीलिंग भाववाचक संज्ञा है। यही इनका मुख्य व्याकरणिक अंतर है। दोनों शब्द मूलतः मुच् धातु से बने भाववाचक शब्द हैं और दोनों का आधारभूत अर्थ “ बन्धन से छूटना ” ही है। हम कह सकते है की मुक्ति और मोक्ष मूलतः परयाई वाची शब्द है , और अगर परयाई वाची है तो शाब्दिक तौर पर हम किसी भी वाक्य में इन्हें बराबर इस्तेमाल कर सकते हैं। पर ऐसा नहीं है। हम यह तो कह सकते है की किसी व्यक्त को कारागार से “ मुक्ति ” (निजात) प्राप्त हो गई है पर यह कभी नहीं कहते की उसको कारागार से “ मोक्ष ” प्राप्त हो गया है। एक और उदाहरण ऋग्वेद से लेते हैं। ऋग्वेद के सप्तम मंडल की ऋचा ५९.१२ जिसे हम म...